Department of Maithili

Introduction of the department

Maithili is an Indo-Aryan language spoken in native parts of India and Nepal. In India, it is widely used in Bihar and north-eastern Jharkhand. In Nepal, it is native to eastern Terai and is the second official language of the country. From 8th century, Maithili literature constitutes of poetry, drama, short stories, novels, documents and other huge writings in the Maithili script called TIRHUTA (MITHILAAKSHAR). The most famous literary figures in Maithili are the prose writer, Jyotirishwar (1280-1340) and poet Vidyapati (1360–1450) who wrote their works in Maithili, at a time when state's official language was Sanskrit.

The department offers Undergraduate and Post-Graduate courses. Apart from that, it offers subsidiary program in B.A. honours and in 11th and 12th as well. The students are continuously assessed through classroom interactions, tests, quizzes, assignments, group discussion and projects.The student’s success rate is 100% and most of our students are well placed in good organizations and in government services. Since, Maithili is included in the 8th schedule of the constitution; students appear in Union Public Service Commission (UPSC) and Bihar/Jharkhand Public Service Commission (BPSC/JPSC) exams with Maithili as their core subject. Students opting for this subject can also apply for the job of translators in Lok Sabha/Rajya Sabha/RBI and other government and banking sector. Many students are working as professors in universities of India and Nepal and as teachers and principals in government schools. Many of them are working in corporate sector also.

Importance of the subject

In the age of globalisation, where domination of one language, one food habit, same costumes, rituals and cultures are over-powering the entire world, it is necessary to feel the individuality and diversity of language and its rich traditions, history and culture. Language and dialects, the core tool of communication is slowly dying in the time of globalisation. In this worse situation, the state of Bihar and its government are trying their best to save its geographical individuality, speciality, local rituals and cultures, languages and dialects. In the journey of about three decades of the department, in this college, it has played an important role in this conflict and has imbibed a sense of humanity, sensibility and the process of knowledge and learning through their mother tongue. By the study of this language and literature, students get to know about the importance and rich history of Maithili and are passing it on to the upcoming generation.

 Major contributions of the department towards knowledge generation

The department creates a learning environment which is helpful for the development of the ability to think critically and independently and making of socially aware and enthusiastic students who have imbibed human values and are ethical in their practices.The department not only focuses on textbook and theoretical knowledge but also on sensitizing students towards the issues and subjects which needs attention, so that the acquired learning can translate into positive social intervention.The activities conducted by the department provides learning opportunities and exposure to the students. Essay-poetry writing and recitation activities are regularly organized by the department to promote student participation and performance. Guest lectures, online and offline seminars, interactive sessions on relevant themes are also organized. The department provides constant guidance and counselling on both academic and personal issues of the students.

परिचय

मैथिली भारोपीय भाषा-परिवारक भाषा थिक जे भारत आ नेपाल मे बाजल जाइत अछि। एक दिस भारत मे, बिहार आ उत्तर-पूर्वी झारखण्ड मे एकर व्यापक उपयोग होइत अछि तँ दोसर दिस नेपालक तराई क्षेत्र मे। नेपाल मे मैथिली दोसर राजकीय भाषा थिक। आठम शताब्दी सँ मैथिली मे गद्य आ पद्य लिखित रूप सँ उपलब्ध भेटैत अछि, जाहि मे कविता-गीत, नाटक, कथा आदिक संगहि अन्य दस्तावेज शामिल अछि, जे अधिकांश मिथिलाक्षर अथवा तिरहुता लिपि मे अछि। मैथिलीक प्रसिद्ध साहित्यिक अवदानी पुरुष मे गद्यकार ज्योतिरीश्वर (1280-1340) आ महाकवि विद्यापति (1360-1450) छथि जे राजकाजक तत्कालीन भाषा संस्कृत रहितहु मैथिली मे साहित्य सृजन कयलनि।

मैथिली विभाग मे स्नातक आ स्नातकोत्तर स्तरक पाठ्यक्रम संचालित होइत अछि। एकर अतिरिक्त, स्नातक (प्रतिष्ठा) मे सब्सिडीयरी विषयक रूप मे तथा एगारहवीं आ बारहवीं स्तर पर सेहो पढाओल जाइत अछि। छात्र-छात्रा लोकनिक सतत मूल्यांकन कक्षा मे तँ होइतहि छनि जे परीक्षा, क्विज, समूह चर्चा, प्रोजेक्ट-कार्य आदिक माध्यम सँ सेहो कयल जाइत छनि। विद्यार्थी लोकनिक सफलताक प्रतिशत शत-प्रतिशत अछि तथा अधिकांश नीक संस्थान आ सरकारी कार्यालय मे उच्च-पदस्थ छथि। मैथिली भारतीय संविधानक आठम अनुसूची मे सम्मिलित भाषा थिक, अस्तु विद्यार्थी लोकनि संघ लोक सेवा आयोग, बिहार लोक सेवा आयोग आ झारखण्ड लोक सेवा आयोगक विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा मे मुख्य विषयक रूप मे मैथिली राखि सम्मिलित होइत छथि आ सफल होइत छथि। लोकसभा, राज्यसभा, भारतीय रिजर्व बैंक सहित अन्य बैंक ओ व्यापारिक संस्थान मे अनुवादकक पद पर सेहो कार्यरत छथि। अनेक छात्र-छात्रा भारत आ नेपालक अनेक विश्वविद्यालय मे प्राध्यापक पद पर कार्यरत छथि तँ अनेक सरकारी स्कूलक शिक्षक आ प्रधानाध्यापक पद धरि सेहो सुशोभित कयलनि अछि। अनेक तँ कॉरपोरेट सेक्टर मे सेहो सफलतापूर्वक कार्य क’ रहल छथि।

विषयक महत्त्व

भूमंडलीकरणक वर्त्तमान समय मे जतय एक भाषा, एके रंगक भोजन, एके तरहक वस्त्र, रीति-रिवाज आ संस्कृति सम्पूर्ण विश्व केँ गछाड़ने जा रहल अछि, ई अत्यंत आवश्यक अछि जे भाषाक निजता आ विशिष्टताक सम्मान कयल जाय आ ओकरा अक्षुण्ण रखबाक प्रयास कयल जाय। ओकर गौरवशाली परम्परा, इतिहास आ संस्कृति केँ बचयबाक प्रयास कयल जाय। भूमंडलीकरणक एहि दौर मे मुदा सम्प्रेषणक ई प्रमुख माध्यम “भाषा आ बोली” धीरे-धीरे विलुप्त भ’ रहल अछि। एहि विपरीत परिस्थिति मे सेहो बिहार राज्य आ ओकर सरकार अपन भौगोलिक निजता आ विशिष्टता, स्थानीय रीति-रिवाज आ संस्कृति, भाषा आ बोली केँ बचयबाक लेल प्राणपण सँ प्रयासरत अछि। एहि कॉलेज मे मैथिली विभागक लगभग तीन दशकक अनथक यात्रा एहि दिशा मे महत्त्वपूर्ण माध्यम बनल अछि। मातृभाषाक माध्यम सँ मानवीयता, संवेदनशीलता आ ज्ञानार्जनक लेल उत्प्रेरक बनल अछि। मैथिली भाषा-साहित्यक अध्ययन सँ विद्यार्थी लोकनि मिथिलाक महत्त्व, इतिहास आ परम्परा सँ तँ अवगत होइतहि छथि, प्राप्त ज्ञान केँ अगिला पीढी धरि पहुँचयबा मे सेहो समर्थ भ’ रहल छथि।

ज्ञानार्जन लेल महत्त्वपूर्ण योगदान   

स्वतंत्र आलोचकीय दृष्टिकोण सँ विमर्श करबाक हेतु विभाग छात्र-छात्रा लेल ज्ञानार्जनक समुचित वातावरण उपलब्ध करबैत अछि। एहि क्रम मे हुनका सामाजिक रूप सँ जागरूक आ प्रतिबद्ध बनबैत मानवीय मूल्य सँ ओतप्रोत करब आ तकरा जीवन मे व्यावहारिक रूप देबाक लेल उत्प्रेरित करैत अछि। विभाग मात्र पाठ्य-ग्रंथक आधार पर सैद्धांतिक ज्ञान मात्र धरि केन्द्रित नहि रहि, ओहि सभ सामाजिक-आर्थिक समसामयिक आ ज्वलंत विषय पर संवेदनशील बनयबाक प्रयास करैत अछि जे सीखल ज्ञान केँ सकारात्मक सामाजिक हस्तक्षेप मे परिणत करबा मे सबलता प्रदान करए। विभागीय गतिविधि छात्र-छात्रा केँ सिखबाक आ व्यक्तित्व विकासक अवसर प्रदान करैत अछि। निबंध आ काव्य लेखन तथा पाठ प्रभृति गतिविधि विद्यार्थीक सहभागिता आ प्रदर्शन केँ उच्च मूल्यवत्ता प्रदान करैत अछि। प्रासंगिक आ मूल्यवान विषय केन्द्रित अतिथि व्याख्यान, ऑनलाइन आ ऑफलाइन संगोष्ठी, अंतर्क्रियात्मक सत्र आदि सेहो आयोजित होइत अछि। विद्यार्थी लोकनिक पढाई-लिखाईक अतिरिक्त हुनक व्यक्तिगत समस्याक समाधान लेल सेहो विभाग मार्गदर्शन आ काउंसलिंग करैत अछि।

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